Monday, February 7, 2011

वजह चाहिए

एक इश्तिहार दिया था कल हमने
की कुछ वजह चाहिए
वजह चाहिए अब जीने की

खिलते फूल अछे लगते हैं
चलती हवा से भी प्यार है
आसमान की सियाही
पत्तो का हरा
और बादलो से रात का बुना
सब अछे लगते हैं
पर वजह नहीं..

पापा का प्यार
माँ का दुलार
छोटे बडे भाई-बहनों का आवाज़ लगते रहना
कुछ कहना कुछ सुनना
अच्छा लगता है
पर वजह नहीं..

हर महीने आती तनखाह
अच्छे कपढ़े, मेंह्गे शौक
बाहर घूमना
अच्छी-बुरी पिक्त्चरै देखना
अच्छा लगता है
पर वजह नहीं..

देश-विदेश की बातें
कहीं तबाही कहीं आजादी
कुछ खट्टी-मीठी बातें
कभी नाराज़ हो अपने बिल में छुप जाना
और कभी धधकते हुए बाहर आना
अच्छा लगता है
पर वजह नहीं..

सब इन्ही में जी लेते हैं
हम भी कोई ख़ास तो नहीं
जी रहे हैं..

जब हम ही ना हल कर पाए
तो इश्तिहार क्या करेगा
पर हर बात पे इश्तिहार देना
अब अच्छा लगता है
पर वजह नहीं..

वजह की रूह मिल जाये, उससे रेशम चढ़ा देंगे..
जो संभली ना कहीं फिर भी, कोई खांचा लगा ­ देंगे

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